भाटापारा- जमाना गुजरा, जब यहां खरीददारों की भीड़ लगी रहती थी। इस भीड़ ने अब अपनी दिशा बदल दी है और छीन ली है उस बाजार की रौनक जिसके बिना घरों का बनना कभी असंभव था। जी हां! यह ऐसा बाजार है जहां बांस और बल्लियां बिकती हैं। आज यह खामोशी के बीच राह देख रहा है अपने उस ग्राहक की, जिसकी हिम्मत से इसे हिम्मत मिलती थी।

हर क्षेत्र को तगड़ा झटका दे चुका कोरोना ने इसे भी जोर का झटका दिया है। दूसरे कारोबार तो खड़े होने लगे हैं लेकिन इसके हाथों से अब बाजार छूट चुका है क्योंकि खरीदी की दिशा बांस और बल्ली की जगह, लोहे के पाइप, एंगल की ओर जा चुकी है और अपने पीछे छोड़ गई है ऐसा सन्नाटा जिसे दूर करने के जतन में हर प्रयास फिलहाल तो असफल हो चुके हैं। इसलिए अब कीमत कम करके हाथ से जा चुके बाजार को फिर से हाथ में लाने की कोशिश का किया जाना चालू हो चुका है।

इसने छीनी रौनक
जमाना था बांस-बल्ली का, जिसकी मदद के बिना घर का बनाया जाना असंभव काम था। समय बदला, अब जमाना है लोहा का। बांस और बल्लियों की जगह लोहे की लंबी पाइप ने एक झटके में ले ली है। चले सालों-साल, मजबूती बेमिसाल जैसे मजबूत तर्क के सामने यह बाजार एक झटके में धराशायी हो गया। रही-सही कसर कोरोना और लॉकडाउन में पूरी कर दी।

यह भी हुए दूर
घरों के बनाने के साथ इसे एक और क्षेत्र खरीददार के रूप में मिला करता था। यह खरीददार वे हैं जिन्हें बांस शिल्पी कहा जाता है। पहचान मिली बंसोड़ के नाम से लेकिन इनके लिए रखी गई विशेष गुणवत्ता वाली इन सामग्रियों को खरीदने वाले बंसोड़ भी रास्ता छोड़ चुके हैं क्योंकि इनकी बनाई सामग्री की जगह प्लास्टिक के सूपा, टोकनी और खरहरा ने ले ली है।

छूटा तीसरा सहारा भी
कृषि उपज मंडी। जहां कभी बैल गाड़ियां गांव से आती थीं और वे गाड़ियां जिनकी मदद से कृषि उपज मिलों तक पहुंचती थी। मजबूत सहारा थी इस बाजार की, लेकिन अब बैल गाड़ियों की जगह ट्रैक्टर और ट्रकों ने ले ली है। इसलिए ऐसी बैलगाड़ियों के लिए जरूरी बांस और बल्लियों की खरीदी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। एक और बदलाव यह भी आया है कि अब लकड़ी नहीं, लोहे की बैलगाड़ियां बनने लगीं हैं।

हजार के लिए तरस रहा
कृषि उपज मंडी से लगी रिंगरोड पर बांस बल्लियों का बाजार अब हजार रुपए के लिए तरस रहा है। निकल चुके बाजार की वापसी के लिए अब बांस 80, 90 और 100 रुपए जैसी तीन दर पर इसकी बिक्री करने के लिए तैयार हैं तो 105 से 130 रुपए नग की दर पर बल्लियां बेची जा रही है लेकिन कांक्रीट और लोहा ने इस बाजार की 75 फ़ीसदी हिस्सेदारी छीन ली है। लिहाजा अब हजार रुपए के लिए तरस रहा है यह बाजार।

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